एक सुंदर प्रतिमा सी लगी तुम मुझे मेरे प्यार के बदले मे मिला तुम्हारा यह प्रेम मय रूप जो शांति और पवित्रता के है अनुरूप
देखकर मै ठगा सा रह गया मन्दिर के भीतर प्रतिष्ठित एक सुन्दर प्रतिमा सी लगी तुम
दीपक सा मै जलता हुवा अब रह गया खूब
समक्ष मेरे अदृश्य केवल मौन है सोचता हूँ इस जहां मे सिवा तुम्हारे मेरा कौन है
आराधना मे तुम्हारे होकर तल्लीन मूक
kishor
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