चिर अपरिचिता .....अपनी सुंदरता की आँखों से चिर अपरिचिता .....अपनी सुंदरता की आँखों से
चिर अपरिचिता के दिल के घर के दरवाजे ने मुझसे कहा -
मुझे खटखटाओ
लेकीन खिड़कियों के अपारदर्शी कांच तक ही पहुच पायी मेरी आँख
उस घर की छत पर रखे गमलों मे खिले फूलो की एक एक पंखुरियों की तरह झरते गए धीरे धीरे मेरी जिंदगी में मेरे इंतजार के बहुमूल्य पल
आँगन की हथेली मे रची बसी मेहंदी की पत्तियों ने मुझ प्रेमी की दर्शानाभिलासी दृष्टी कों रँगे हाथो पकड़ लिया था
सागौन की खामोश सी जड़ ने पढ़ लिया लिया था उस चिर अपरिचिता के मन की पक्की दीवार के बाहर से ही मेरी ब्याकुल मंशा
मायुश होकर इस जीवन की यात्रा कों लौटता देख मुझसे - मेरी अंतरात्मा का शहर कहने लगा ......
मृत्यु की शाम तक सडको की ख़ाक छानकर मेरे किसी उपवन के संग बैठकर फ़ीर से लौट आना
उस तट पर जहा - सजीव लहरों का जमघट लगता है
जहा पर - सूरज सागर के जल मे डूबने से पहले उलट कर रखी एक लाल कटोरी सा दीखता है
तभी गीली रेतो कों उसके पद चिह्नों के अंकित होने का कोमल अहसास होता है
बार बार गालो पर पहुच आये अलको कों हटाने मे हवा के हाथो की सम्मोहित सी नर्म उंगलियों कों खुद से प्यार हो जाता
तब देख लेना तुम भी उसे
उसका दमकता हुवा सौन्दर्य देखकर संध्या के पाँव भी जाते जाते कुछ क्षणों के लीये थम जाते हैं .....
फ़ीर तुम तो उसे चाहने वाले पुरुष हो
यह बात और है शहर ने कहा -
संध्या उसे देखेगी और वह निराकार चिर अपरिचिता अपनी सुन्दरता की आँखों से
तुम्हारे
अनन्य भक्ती के स्वर्ण -अणुओ से निर्मित तुम्हारी साकार काया के रूप कों निहारेगी एकटक निरंतर ...........
किशोर |